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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

ख्वाहिशें

अजय अमिताभ सुमन

ख्वाहिशों की बात में इतना सा फन रखा , जो हो सकी ना पूरी, उनको दफन रखा। जरूरतों की आग जब भी तपने लगी , बचता रहा था बेशक एक सफन रखा। हादसे जो घट गए क्या रोना था उन पे, और मुश्किलें जो आनी थी मदफन रखा। हसरतों जरूरतों के दरम्यान थी जिन्दगी , थोडा इसपे लगाम थोडा उसपे कफन रखा। मुसीबतों का क्या था आती रहीं जाती रहीं , सोंच में अल्हड़पन ना जज्बात पचपन रखा। रूह के रूआब में कसर ना रहा बाकी , थीं जिनसे भी इतनी सी नफरत अमन रखा। जिंदगी की फ़िक्र क्या मौज में कटती गई , बुढ़ापे की राह थी और जिन्दा बचपन रखा।

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