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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

आदमी के लिए पाप है आदमी

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी

आदमी के लिए पाप है आदमी, इस धरा के लिए शाप है आदमी। यह प्रदूषण,नये रोग, नव आपदा, हर समस्या का एक बाप है आदमी। अपने कर्मों से जग को जलाता रहा, वन हुतासन सरिस ताप है आदमी । देखकर पाप तेरे दुखी हो रहा, तू विधाता का संताप है आदमी । तेरे डसने से धरती गरलमय हुई, आदमी है कि ,तू साँप है आदमी ?

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