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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

नवगीत
रखते हाथ निवाले हैं

कृष्णलता यादव

वे क्या जानें तड़प पेट की रखते हाथ निवाले हैं किसकी रातें फुटपाथों पर किसके तन पर चीर नहीं इस पर चिन्तन करने वाला उनमें चिन्तनवीर नहीं। हरियाली से भरी तिजोरी कुंजी के रखवाले हैं श्वान-जाति के बड़अनुरागी उसको गोद खिलाते हैं महंगे वाला भात खिलाकर आपा बहुत रिझाते हैं। एक और पहचान बताएँ तिरछी उनकी चालें हैं सदा सुहावन मौसम उन हित कोई शिकवा राग नहीं अलग-थलग उनकी दुनिया में किसी और का भाग नहीं। मिला विरासत में कुछ ऐसा रहते दूर कसाले हैं गंगा लौटे भले स्वर्ग को उन्हें फ़र्क क्या पड़ना है देहरी-ऊपर सब सुख-सुविधाएँ किसकी खातिर लड़ना है। ऋतुओं के रसिया कहलाते, ऐसे वे मतवाले हैं


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