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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

मोबाइल से कब तक खेलूँ?

बृज राज किशोर 'राहगीर'

सभी दोस्तों ने ले ली है, 'लाइव' होने की अँगड़ाई। संदेसा मिल जाता पहले, फ़लाँ समय प्रकटूँगा भाई। मुश्किल में हूँ, किस-किस को मैं, कहाँ-कहाँ तक, कितना झेलूँ? भूख नहीं है जब प्रचार की, ज़्यादा नहीं प्रसिद्धी पाना। पढ़ने-लिखने में ही खुश हूँ, मुझे नहीं चेहरा चमकाना। बिना किसी तृष्णा के साधो, मैं क्यूँ ऐसे पापड़ बेलूँ? इसी समय का सदुपयोग कर, कई किताबें पढ़ सकता हूँ। चिन्तन और मनन की सीढ़ी पर, कुछ ऊपर चढ़ सकता हूँ। किसी मनीषी के चरणों में बैठूँ और ज्ञानधन ले लूँ।।

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