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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 93,सितम्बर(द्वितीय), 2020

नदियाँ
(सार छंद)

महेन्द्र देवांगन "माटी"

कलकल करती नदियाँ बहती , झरझर करते झरने । मिल जाती हैं सागर तट में , लिये लक्ष्य को अपने ।। सबकी प्यास बुझाती नदियाँ , मीठे पानी देती । सेवा करती प्रेम भाव से , कभी नहीं कुछ लेती ।। खेतों में वह पानी देती , फसलें खूब उगाते । उगती है भरपूर फसल तब , हर्षित सब हो जाते ।। स्वच्छ रखो सब नदियाँ जल को , जीवन हमको देती । विश्व टिका है इसके दम पर , करते हैं सब खेती ।। गंगा यमुना सरस्वती की , निर्मल है यह धारा । भारत माँ की चरणें धोती , यह पहचान हमारा ।। विश्व गगन में अपना झंडा , हरदम हैं लहराते । माटी की सौंधी खुशबू को , सारे जग फैलाते ।। शत शत वंदन इस माटी को , इस पर ही बलि जाऊँ । पावन इसके रज कण को मैं , माथे तिलक लगाऊँ ।।

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