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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

सीमा जैन ‘भारत' के उपन्यास "अंधेरे से उजाले की ओर" की समीक्षा

समीक्षक - भगीरथ परिहार

लेखिका ने सामान्य से रोजमर्रा जीवन को औपन्यासिक कृति में व्यक्त करने का साहस और चुनौती स्वीकार कर ‘पहले कदम का उजाला’ उपन्यास को रचा है. यह सीमा जैन का पहला उपन्यास है जो रोचक और पठनीय है, जिसमें एक पत्नी के अँधेरे से निकल रोशनी की ओर कदम बढ़ाने की संघर्ष गाथा को प्रेरक कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

इस कथा में नायिका सरोज अपने जीवन को ही नहीं अपनी पुत्री के जीवन को भी रौशन करने में सफल रही है. यह सफलता पात्र की ही नहीं उस पात्र के रचियता की भी है. यह कथा घरेलू हिंसा से पीड़ित स्त्रियों के लिए प्रेरणादायक है जो अभी तक अँधेरे से निकलने का साहस नहीं जुटा सकी है. स्त्री-पुरुष की मानसिकता में कुछ परिवर्तन ला सकने में भी यह कृति समर्थ है.

अपने में घुटती, चुप रहती सब कुछ- अपमान,उपेक्षा और हिंसा सहन करती स्त्रियाँ जब बोलने लगती है और अपने अँधेरे से एक कदम उजाले की ओर बढाती है तो बहुत अच्छा लगता है कि वे साहस के साथ आगे बढ़ने की कूवत अपने में पैदा कर रही है. उन्हें अनएक्स्पेटेड जगहों से भी सहायता मिलती है जैसे इस उपन्यास में नायिका को डाक्टर परिवार और पुजारी परिवार से सहायता मिलती है.

वे उसकी हिम्मत की सराहना करते है. वह उनका भरोसा जीत लेती है लेकिन जिनकी सेवा रात-दिन करती है उनका भरोसा वह कभी नहीं जीत पाती है. डॉक्टर दम्पति के सहयोग से अपना टिफिन सेंटर खोलना और फिर भोजन के स्वाद से उसका बढ़ते जाना उसमें आत्मविश्वास के बीज बो देता है तभी तो वह पति और सास के हतोत्साहन के बावजूद अपने काम पर डटी रही.

किचन क्वीन की प्रतियोगिता जीतने की सफलता ने उसके कद को काफी बढ़ा दिया उसके अभिनन्दन के अवसर पर उसने वह सब बोल दिया जो उसके मन में घुमड़ रहा था, पति सामने बैठे थे और झुंझला रहे थे, वे स्टेज पर भी चढ़ आए और खींच कर ले गए उनका अहं बुरी तरह आहत हो गया लेकिन वह अपने रास्ते पर मुस्तैद खड़ी रही.

बेटी रोली का लम्बे समय तक इलाज करनेवाले डॉ देव और नायिका के बीच अव्यक्त प्रेम तब सामने आया जब वह लद्दाख की यात्रा पर गई. लेखिका ने उनके विलक्षण और रूहानी प्रेम को निराले अंदाज में व्यक्त किया है.

एक विशेष बात जिसका उल्लेख जरुरी है कि लेखिका ने भावपूर्ण क्षणों को कविताओं में जीया है वे सहज रूप से कथा प्रवाह को सतत प्रवहमान रखती हैं. उपन्यास का अंत सार्थक है क्योंकि पाठक को संघर्ष कथा के तनाव से मुक्त कर देता है फिर भी एक कशिश रह जाती है कि काश! सरोज और डॉ देव का मिलन हो ही जाता.

लेखिका सीमा जैन को इस उपन्यास के लिए साधुवाद. इस अपेक्षा के साथ बधाई कि जल्द ही वे अपना दूसरा उपन्यास हम लोगों के समक्ष प्रस्तुत करेगी.

पुस्तक विवरण:- पहले कदम का उजाला
सीमा जैन ‘भारत'
लोकमित्र प्रकाशन
₹150
समीक्षक -भगीरथ परिहार


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