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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

श्वास कैसे आये

डॉ० अनिल चड्डा

पास रह के भी जो दूर रहे, वो पास कैसे आये, घुट-घट कर जीना पड़े, तो श्वास कैसे आये। चहुँ और टूटे दिल पड़े हैं, चहुँ और बेवफाई फैली है, सच्चे दिल वाले को, फिर विश्वास कैसे आये। आदतन हम कह जाते सही-गलत के अंतर को जो जान कर भूल करता हो बात मेरी रास कैसे आये। मन उदास जब रोता है, तो जग सारा ये सोता है, बात कहे किससे अपनी, चैन की साँस कैसे आये।

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