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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

आदतन ही हँसते रहे

डॉ० अनिल चड्डा

आदतन ही हँसते रहे, वर्ना ग़मों का अंबार बहुत था। झुकना सीखा नहीं था, वरना दिल पे तो भार बहुत था।। साथ देने की मुश्किलों से, घबरा कर छोड़ गए थे वो। चाह कर भी न हो सके मेरे, वर्ना मुझसे प्यार बहुत था।। बात कहते ही दूजे की होने के डर से कुछ कहा नहीं। आँख भी मिलाई न उसने, वर्ना इकरार बहुत था।। आई थी याद बीती रात भी मुझे, सपने में ही आके मिल जाते कभी। पर नींद ही न आई याद में तेरी, वर्ना सपने का इंतजार बहुत था।। सुना था दुआओं का होता है असर, कोई माँगे दुआ इक हमारे लिये, उनके दिल में भी चाहत हो मेरे लिए, वर्ना हल्का सा दीदार बहुत था।।

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