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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

होगा संकट में जीवन

राज कुमार तिवारी

न कोई प्रलय आयेगी! न कोई सुनामी आयेगी! किन्तु एक दिन तो जरूर आयेगा जिस दिन मनुष्य अपने ही बिछाये हुये जाल में फंस कर पंख फड़फड़ाने लगेगा और उसे बचाने वाला कोई नहीं होगा। वर्तमान समय के मनुष्य की जरूरतें बहुत तेजी से बढ़ रहीं हैं। बिना सोंचे समझे नये नये अविष्कार निरन्तर किये जा रहे हैं। उन आविष्कारों में एक सबसे बड़ा आविष्कार आज के दौर में प्रचलित है टेलीकॉम कंपनियों का है जो दिन दूना रात चौगुना विकास कर रही हैं। एक दूसरे को नीचा दिखाने के कारण इलेक्ट्रानिक क्षमताओं को निरन्तर बढ़ाया जा रहा है, जिसका दुष्परिणाम आज के दौर में प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। जरूरत है तो उस पर विचार करने की!

वर्तमान समय में मनुष्य के अन्दर घबराहट और चिड़चिड़ापन बहुत अधिक होने लगा है। मनुष्य के स्वभाव में अभी मामूली बदलाव आया है। वो इस लिये कि उसका शरीर अभी प्रतिरोधक क्रियाओं को झेलने में सक्षम है। हमारे बीच कुछ जीव जन्तु इस प्रकार के भी थे जो आधुनिकता को नहीं झेल पाये! और आज वो कहीं हमसे बहुत दूर जाकर चहचहा रहे होंगे! जी हाँ हम बात कर हैं उन पंक्षियों की जो आप आज से 10 से 15 वर्ष पहले देखते थे। किन्तु वह अचानक कहाँ चले गये! और क्यों चले गये! इसकी परवाह किसी को नहीं है! शायद आज हम इंसान नहीं रहे। हम मशीन बनते जा रहे हैं। चारों ओर से हम मशीनों से घिरते जा रहे हैं। पर्यावरण के तंत्र को बिना सोचे समझे हम यंत्रों की इमारत खड़ी करते जा रहे हैं! जबसे मोबाइल कंपनियाँ अस्तित्व में आईं हैं तब से पक्षियों का अस्तित्व खतरे में दिखाई देने लगा है। समय के साथ टावरों का विस्तार होता गया! और पक्षियों का स्तर लगातार गिरता गया। और, आज इतना गिर गया है कि गिद्धों का तो नामोनिशान मिट गया! तरह- तरह की चिडि़याँ, जो देखने को मिलती थीं, वह सब अचनाक गायब हो गईं। नील गगन एक दम सूना सा हो गया! सांझ के वक्त पेड़ों व झुर्मुटों से सुनाई देनें वाला कलरव अब हमसे कोसों दूर हो गया! अब हमारे कानों को चहचहाट की जगह सिर्फ चीख पुकार सुनाई दे रहा है! वो इस लिये कि आज हम स्वार्थी बन गये हैं। सिर्फ अपने बारे में सोचने लगे हैं! न तो हमें दूसरों की सुख-सुविधा का ख्याल है और न ही हमें पर्यावरण की चिंता है! यही नहीं आज का इंसान जंगलों पर इस कदर टूट पड़ा है कि दूर-दूर तक दिखाई देनी वाली हरियाली अब दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है! जंगल में रहने वाले प्राणियों को अब कहीं ठिकाना नही मिल रहा है! इसका नतीजा यह है कि जंगली सियार अब रात को गाँवों में घूमते नजर आ रहे हैं! उनके अन्दर जो मनुष्य का डर था वह धीरे-धीरे गायब हो रहा है। पहले ये जानवर मनुष्य को देखते थे तो जंगल की ओर भागते थे। अब आलम यह है कि इनको जब भगाया जाता है तब ही भागते हैं, वह भी बिना मन के।

सभी पक्षियों में अगर देखा जाये तो कौआ कुछ शहनशील पक्षी दिखाई पड़ा जो वर्षों से वायु मण्डल में मौजूद नेटवर्क की तरंगों को झेलता आ रहा है। लेकिन लगातार बढ़ रही तरंगों के कारण अब इनकी संख्या में भी भारी गिरवाट देखने को मिलने लगी है! आंगन में फुदक- फुदक कर चलने वाली गौरैइया भी बहुत ही कम दिखाई पड़ रही है। गौरैइया के कम दिखाई देने का कुछ कारण यह भी है कि आज के दौर में सभी के घर कंकरीट के हो चुके हैं। इसलिये, इनके रहने के लिये किसी के घर में जगह ही नहीं है। हमारे आस-पास मौजूद परजीवी जीवों के बारे में किसी को जरा सा भी ख्याल नहीं है। जिस तरह आज मानव परजीवी जीव जन्तुओं को नजरअन्दाज करने लगा है, उसी तरह से वो धीरे-धीरे हमारे बीच से गायब भी होते जा रहे हैं। किसी ने सच ही कहा है जब किसी देश के व्यक्तियों के बारे में जानना हो तो उस देश के पशु पक्षियों पर एक नजर डाल लेनी चाहिए। उनके साथ हो रहे व्यावहार से उस देश के व्यक्तियों की मानसिकता का आकलन बड़ी ही आसानी से किया जा सकेगा।

आने वाला समय सम्पूर्ण मानव जाति के लिये बहुत ही भायनाक साबित हो सकता है। अभी हम 4G में जी रहे हैं। आगे 10G तक की सम्भावनाएं अपार हैं। क्योंकि ये सच है जिसके पास जो होता है वह कम ही दिखाई पड़ता है! उसका विस्तार करने के लिये मनुष्य निरंतर प्रयासरत रहता है। 2G अथवा 4G ये सब मात्र बानगी हैं। अभी इसमें बहुत कुछ बाकी है। एक दिन ऐसा आ जायेगा की हर मनुष्य अपने साथ एंटी रेडियेशन लेकर चलेगा क्योंकि उन दिनों में वायु मण्डल के अन्दर इतनी प्रबल इलेक्ट्रिक धारा का प्रवाह होगा कि मनुष्य का शरीर उसे सह पाने में असमर्थ होगा! चाह के भी इस प्रवाह को रोका नहीं जा सकेगा, क्योंकि उस समय का सारा दारोमदार उसी प्रवाह पर निर्भर होगा। और, बीमारी की जो वैतरणीय बहेगी उसे हर कोई पार तो करना चाहेगा परन्तु उस वक्त किसी को कोई गाय नहीं मिलेगी कि पूँछ पकड़ कर वैतरणी पार कर सके। उस समय लोगों के घरों में भी बदलाव देखने को मिलेगा, क्योंकि अभी के लोग जमीन के ऊपर घर बना रहे हैं। किन्तु उस समय लोग जमीन के अन्दर घर बनाना शुरू कर देगें। इसका एक कारण यह भी होगा उन दिनों सूरज में तपन आज से अधिक होगी! वो इसलिये कि मनुष्य अपनी हरकतों से बाज आने वाला नहीं है। न तो उसे आज अपने पर्यावरण की चिन्ता है और न ही उस समय उसे ओजोन परत की चिन्ता रहेगी। दूसरी ओर सभी के पास समय का अभाव होगा। किसी के लिये किसी के पास समय नही रहेगा। बीवी बच्चे, माता, पिता, भाई, बहन सभी के साथ औपचारिकता ही निभाई जा सकेगी। एक समुचित समय किसी को नही दिया जा सकेगा। यही नहीं मनुष्य के जीवन काल व उसके आकार में भी बहुत बड़ी कमी पायी जायेगी। एक दिन ऐसा भी आ जायेगा जिस दिन पृथ्वी पर चारों ओर हाहाकार मचाने वालों को हम ही बुलायेंगे, क्योंकि हमें दूसरों के घर में झांकने की बहुत बुरी आदत है! कोई मतलब नहीं, फिर भी हम ताका-झांकी करने से बाज नही आते हैं! चाहे वो चाँद हो, या मंगल हो, बृहस्पति, शनि, हो। अब तो यह भी देखने की कोशिश करने लगे हैं कि सूरज में आखिर क्या जल रहा। हम तो सिर्फ सैर करने जाते हैं। किन्तु हमारी इस सैर सपाटे से कोई तंग आ जायेगा तो शायद वह हमें लगंडा लूला ही बन के छोड देगा।


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