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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी

ओदाजी

प्रातः काल जब गृह से बाहर जाते है और कोई भी जन मिलता है तो मुख से निकलता है राम जी राम राम क्या हाल है ????, भईया जी राम राम, भाभी जी राम राम इत्यादि यदपि ये मुहं में ही होता है और यदि ये हृदय में हो तो क्या होगा !!!!! ईश्वर की उपस्थिति को सर्वत्र देखना और सम्पूर्ण विश्व को उस ईश्वर का परिवार मानना और अपने को उस परिवार का एक सदस्य मानना ये एक भाव गुण है जिसको सभी प्राय: “वसुधैव कुटम्बकम” के अर्थ में जानते है उस ईश्वर को जिसको लोग विश्वनाथ के रूप में जानते है और जिसको विश्वगुरु भी कहा करते है ये सम्पूर्ण विश्व उसी एक का परिवार है और आप एक सदस्य है तो आप का कर्तव्य और दुसरे सदस्यों का कर्तव्य है एक दुसरे के प्रति और वो इस परिवार में सौहार्द से रहे और एक दुसरे का आदर भी किया करे I

उस विश्वनाथ, विश्वगुरु, ईश्वर के द्वारा निर्मित सम्पूर्ण विश्व में जीव ही नहीं है अपितु अजीव भी उपस्थित है जो यह बताता है की सभी में उसकी उपस्थिति है और उसका आदर करना ही उस विश्वनाथ की वंदना है अर्थात जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि। बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥ रा./बाल उस विश्वगुरु को इस संसार में समाया जानकर हाथ जोड़कर सब के चरण स्पर्श करता हूँ

यह परिवार किसी सामान्य परिवार जैसा नहीं है क्योंकिं ये तो विश्वनाथ का परिवार है और यहाँ एक ही टेड़ा नहीं बल्कि अनगिनित टेड़े है और सभी का आदर होना अनिवार्य है और सभी जन साधक से प्रत्येक क्षेत्र में ऊपर है चाहे वो धर्म हो या अधर्म अर्थात यदि वो सज्जन है तो मेरी प्रेरणा है और उनकों मुझे नहीं लांघना है और वो आगे ही रहे तो मेरा आत्म कल्याण सुनिश्चित है और यदि वो असज्जन है तो उस र ओर तो मुझे जाना ही नहीं है तो मैं नीचे ही ठीक हूँ तो सभी और से मुझे तो नीचे ही रहना उत्तम होगा क्योंकि “प्रभुता से लघुता भली, प्रभुता से प्रभु (विश्वनाथ) दूर” तो सब और से लघुता ही उत्तम है “छोटा जी भर पानी पिये बड़ा प्यासा ही रह जाये” अब मैं इस परिवार के सदस्यों को प्रणाम करता हूँ देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब। बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब॥ अर्थात सुर, असुर, नर, नाग, पक्षी, भूतप्रेत, पितर, गंधर्ब, किन्नर, रात्रि में चलने वाले जीव को मेरा प्रणाम है मैं उनके चरणों की वंदना करता हूँ और चुकी मैं सबसे छोटा हूँ तो सभी का आशीर्वाद और कृपा मांगता हूँ के वो मेरी मति को सत मति बनायेंगे I

ये विश्वनाथ का विश्व अत्याधिक विस्तृत है और साधक को ये पता भी नहीं है की वो विश्व परिवार के सदस्य कहाँ कहाँ बसे है परन्तु ये अनुमान है की “जीव जल थल नभ बासी” वो सभी जल में है भूमि पर है आकाश में है (तीनों स्थानों) बसते है और उनकों अपने परिवार का सदस्य मनाता हूँ और उनकी भी वंदना करता हूँ

तो विश्व नाथ को सर्वत्र जानकर मैं तो सभी जानो को दोनों हाथो को जोड़कर प्रणाम करता हूँ की “सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी”II और इस तरह से परिवार सदस्यों का आदर तो हो ही गया है परन्तु मेरी तो विश्वनाथ की वंदना हो रही है तो मेरा तो मंगल ही मंगल है इस कारण से भी मैं सभी को प्रणाम करता हूँ और उसने भक्ति का मंगल आशीर्वाद भी मांगता हूँ क्योंकिं मैं तो सबसे छोटा हूँ और जो मैं मांगूंगा तो मुझे कोई ने कोई अवश्य दे देगा और न भी दे सका तो विश्वनाथ से निवेदन करके भी दिला देगा तो इस वंदना ने तो मुझे विश्वनाथ की वंदना में ही लगा दिया है तो मैं क्यों न कहूँ “करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी” I


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