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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

धुंधली यादों ने बहुत सताया

वर्षा वार्ष्णेय

कल रात धुंधली यादों ने बहुत सताया जब धूल पढ़ी गर्द को दिल ने उड़ाया ख्वाबों के घरोंदों ने जो तूफान मचाया हकीकत ने जिंदगी की बहुत रुलाया उनींदी आंखों में छिपे थे अरमान सुनहरे सच्चाई के धरातल पर रेत ही हाथ आया सपने कब हुए हैं तेरे और मेरे कभी सपनों की दुनिया ने बड़ा जुल्म ढाया दिल नहीं जानता छलावे की भाषा दिमाग ने कैसा है संगीन कहर बरपाया न हम रह पाए कभी अपने सुख के साथी दुखों के अक्षरों ने हमेशा इश्क़ फरमाया

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