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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

पराजय

स्वीटी कुमारी

जब-जब मैंने प्यार किया, हर बार ही तो मैं ठगा गया हर बार मुझे धोखा ही मिला, एक बार नहीं दो बार किया जब जाना प्यार को पहली बार, एहसास वो कितना खास हुआ छुप-छुप के चोरी-चोरी से, देख उसे दिल बाग हुआ एकतरफा है ये प्यार मेरा, जब जाना ये एहसास हुआ इस प्यार के मैं काबिल ही नहीं, क्या हुआ जो तू परिहास किया ठोकर जो लगी मैं संभल गया, फिर न जाने क्यों फिसल गया जिन कन्धों पर सिर मैं रखकर, रोया वो दिल के पास हुआ बातें बढ़ी, फिर प्यार हुआ, मेरे दिल पर उसका राज हुआ विश्वास जगा फिर फूल खिले, दिल में गुलशन आबाद हुआ आयी पतझर, डाली सुखी, गुलशन सारा बर्बाद हुआ आवाज किये बिन दिल टुटा, शीशे सा चकनाचूर हुआ एक बार संभल जाता गिरकर, फिर पाहन का प्रहार हुआ कृतघ्न की यादों में घुलकर, जीवन सारा बेहाल हुआ देखा न कभी मुड़कर जो मुझे, मैं जीवन से ही हार गया

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