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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

बदला है कुछ

सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता

वक़्त के साथ बदला है कुछ रक़्त के साथ बदला है कुछ सुना था मौसम बदलते हैं सावन नासाज़ बदला है कुछ मुश्किलों के दौर में ज़िंदा हूँ कहो कब हालात बदला है कुछ कितना जोर पड़ता है सीने पे धड़कन का राग बदला है कुछ अंधेरों की आदत हो गयी मुझे कब कहाँ चराग बदला है कुछ घुट-घुट कर जिए बेसबब "उड़ता" नहीं लिखने से कभी बदला है कुछ.


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