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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

तुम जिम्मेदार हो

सपना परिहार

नानी भी अपनी माँ से सीखी होंगी दबना,झुकना, नानी से माँ ,तुमने भी सीखा लड़कियों को सलीक़े में रखना, ढेर सारी हिदायतों में रखना,,! न खुल कर मुस्कुराना, न आत्मविश्वास से चलना, न किसी को मुँह तोड़ जवाब देना, क्यों... माँ,,,क्यों...? क्यों नहीं सिखाया तुमनें सीना तान के चलना, पुरुष प्रधान समाज में सम्मान और हक से जीना, और,,, सबसे बड़ी बात, अपने जिस्म को घूरने और छूने वाले दरिंदे को उसी समय उसके पुरुष होने का अभिमान काट गिराने का, जिसे वो हक समझता है, किसी भी स्त्री का शील भंग करना,,! माँ,,, क्यों करे हर बेटी प्रतीक्षा उसे न्याय मिलने का! जो कभी समय पर मिलता नहीं,,! माँ,, बेटी को आज आग बनने दो,! जिसे छूने की कोई भी करे हिम्मत तो,,,, झुलस जाए उस अंगार में, और,,, किसी भी स्त्री को कभी न छू सके,,,गलत इरादे से,,!


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