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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

हिमालय की गोद से चाँद का मुस्कुराना

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

ये हिमालय की गलियों से चाँद उतर रहा है जैसे -धरा पर मणि रत्न चमक रहा है, कितनी हँसीन हैं ये गलियाँ हिमालय मुस्करा रहा है ये रत्न करोडों मोतियों के बीच चमक रहा है,,। आज इस चाँदनी में वो समां नज़र आ रहा है कुछ पल आँगन में बैठकर इसे निहारती हूँ जब वो दिन की धूप में पेड़ की छाँव की तरह तुम्हारी परछाई नजर आ रही है,। कोशिश कर रही हूँ कि सिर्फ अहसास महसूस करूँ पर समां इतना खूबसूरत है कि! तुम्हें ढूँढ़ने की कोशिश कर रही हूँ ये पव॔त श्रृंखलाएं कितनी अलंकृत हैं सौन्दर्य से भरी हुई श्रृंगार की किरणें फैला रही हैं,,।। ये रूह तुम्हें महसूस कर रही है ये मन्द-मन्द हवा की लहरें ह्दय को अहसास करा रही हैं ये मदमस्त समां तुम्हारी याद दिला रहा है,। वो हल्की सी मुस्कुराहट चाँद के चेहरे पे नजर आ रही है, ये धडकनें तुम्हें पुकार रही हैं, हिमालय की गलियों में तुम्हें बुला रही हैं ,,।। ये हिमालय की गलियों से चाँद उतर रहा है , जैसे-धरा पे मणि रत्न चमक रहा है। तुम्हारी आवाज़ इन गलियों से गूंजती हुई धडकनें महसूस कर रही हैं, दरवाज़े पर खड़ी तुम्हें निहार रही हूँ, वो चाँद की चाँदनी को अपनी व्यथा सुना रही हूँ,। ऐ मेरे चाँद लौटकर आ जा तेरा इन्तजार कर रही हूँ,, यूँ सीढियों पर बैठे तुम्हें निहारती जा रही हूँ ,,।। कितना खूबसूरत है ये समां बफ॔ की बूँदें पेड़ो की टहनियों से टपक रही हैं ,चाँदनी भरी है ये रात मणि रत्नों की तरह चमक रही है,। ये हिमालय की गलियों से चाँद उतर रहा है ,, जैसे-धरा पे मणि रत्न चमक रहा है,,।।


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