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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

वो पहला पन्ना

संतोषी वशिष्ठ

तुम मेरी किताब का वो पहला पन्ना हो, जब खोलती हूँ किताब तो, तुम ही नज़र आते हो,। सांझ कहीं भी ढले,पर हर सुबह तुम ही याद आते हो, ये वो किताब है,जिसमें अल्फाज़ तो नज़र नहीं आयेंगे, पर वो गीत, गजल, छन्द,अलंकार भरपूर हैं,, तुम मेरी पहली शायरी हो,जो बन्द है पर नगमों से भरे श्रृंगार का संगम है,। आते जाते बहुत पन्ने पलटे पर बिना वो पहले पन्ने के सारी किताब खाली थी, छन्द अलंकार बहुत थे पर वो प्रेम रस कहीं न था, तुम मेरी वो पहली किताब हो,,।।


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