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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

जब मंजिल मिल जाती है

रीता तिवारी "रीत"

कर्म पथ पर चल ओ! राही, मंजिल एक दिन मिलेगी। रुक गया तो मंजिल तेरे , हाथों से भी दूर होगी। जब तक मंजिल ना मिल जाती, तब तक संघर्ष करो पथ पर। जिस दिन मंजिल मिल जाएगी, उस सुख का तू भी अनुभव कर। संघर्ष पथ की बाधाएं सब, उस पल में तुच्छ सी लगती हैं। जिस दिन मंजिल मिल जाती है, यह दुनिया सुंदर लगती है। मंजिल को पाने का अनुभव, सुंदर सपनों के जैसा है। मनचाही जब मंजिल मिलती, इतिहास भी सुंदर होता है। सफलता की गौरव गाथा, और नई कहानी होती है। जब मंजिल मिल जाती है तो, जीवन में रवानी होती है।


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