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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

हवाओं का रुख

रेखा भाटिया

आज पूरब की हवाएँ पश्चिम की ओर बहीं , समाचार, सवांदों में तूफानों में ढल गयीं, प्रदर्शनों ,चिताओं ,धरनों में उतर गयीं, लेखन में काली स्याही बन उड़ीं ! इस हवाओं में बड़ा शोर था, भ्रष्ट नेताओं के पाखंड का , धर्मों के खोखले मतों का , डरी मानवता चुप थी इस शोर में ! इस हवाओं में बड़ा प्रदुषण था, आतंकवाद ,जात-पात का जहर, वोटों की निर्लज्ज हवस का जहर, नारी सम्मान दम तोड़ रहा इस प्रदुषण में ! इन हवाओं में बड़ी दुर्गन्ध थी , धर्मों की लड़ाई में जलती सभ्यता की , वासना की लौलुपता में जलती लाशों की, वर्तमान की साँसें घुटती इस दुर्गन्ध में ! जन-मन हुए हैं देखो कितने विचलित, पाँच हजार साल प्राचीन प्रथम सभ्यता , दौर पतन के बहुतेरे फिर भी अशिक्षित , हानिकारक इन हवाओं का रुख मोड़ दो ! काश चमत्कार हो ऐसा, शांति सब ओर , भीतर का बुद्ध पुर्नजन्म ले मन-आत्मा में , जीवट सत्कर्म हो भाईचारा समानता , कमल के फूल-सी खिल उठे मानवता !!!


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