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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

छल- छलावा

रेखा भाटिया

छलावा समाज का छली जाती है बेटी छलावा बेटी बचाओ ,बेटी पढ़ाओ ! छली जाती तप कर कुंदन बन जाती बेटी जला दी जाती दहेज़, वासना की आग में समाज फिर चिल्लाता बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ …………


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