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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

न जाने क्यों

राजीव डोगरा 'विमल'

न जाने क्यों खो सा गया है कही मेरा मन। न जाने क्यों मिट्टी सा हो गया है मेरा तन। न जाने क्यों टूट गया है, उनकी याद में ह्रदय का हर एक कण। न जाने क्यों बिखर गए है, हर ख्वाब मेरे फिक्र में उनकी हरदम।


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