मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

मतलबी इन्सान

मोहिन्द्र शर्मा

कुदरत ने कैसे है इन्सान को बनाया, फिर भी क्या इन्सान ने अपना फ़र्ज़ निभाया, हे ऊँचे ऊँचे महलों में रहने वालो , पक्की -पकाई खाने वालो , क्या तुमने भी कभी कुटिया में, किसी को जीवन यापन करते देखा है । धन दौलत के पीछे भागने वालो, दूसरों की कमाई का हिस्सा खाने वालो , मजदूरों की नींद को हराम करने वालो, क्या तुम भी कभी चैन की नींद सोए हो । दूसरों की मेहनत से जलने वालो , अपने फ़र्ज़ से टलने वालो , दूसरों पर ऊँगली उठाने वालो , जरा अपनी शक्ल तो आयने में देखो , तुम्हारा क्या हाल है । मखमली सेज पर सोने वालो , अपनी नींद गवाने वालो , क्या तुमने फर्श पर सोते हुए , नींद में डुबे हुए शक्स को देखा है । दूसरों के श्रम को बहाने वालो, उनकी मेहनत की कमाई खाने वालो , क्या तुमने कभी पेडों की छाया के , नीचे सोते पसीना बहते शक्स को देखा है । चाँदी की थाली में खाने वालो , मणिजडित सुराही में मदिरा पीने वालो , क्या तुमने कभी मिट्टी के प्यालों में , चाय पीते व रोटी खाते शक्स को देखा है । कुदरत ने कैसे है इन्सान को बनाया , फिर भी क्या इन्सान ने अपना फ़र्ज़ निभाया ।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें