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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

वे कुछ दिन

मोहिन्द्र शर्मा

वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे , जब वर्फ का फाहा फाहा गिरा करता था हम पर , तब देवदार के घने जंगलों पर चलते चलते , जब हम फिसल जाते , तब मैं तुझे और तुम मुझे सम्भाल लेती थी । वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे , जब हम आँख मिचोली का खेल खेला करते थे , मैं बंद आँखों से मन की आँख से , तुम्हें ढूंढ लेता था, और खेलते खेलते दिन बीत जाता था । वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे , जब घनघोर घटाओं में छाए, मेघ बरसते और मोर नाचने लगते , तब बरसते मेघों के बीच हम , नृत्य करते मोरों को देख आनंदित हो जाते । वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे, जब काली घटाओं के बीच हवाओं का झोंका , तुम्हारे बालों को बिखरा देता था , और तुम्हारे काले शेषनाग से बाल , लहरा जाते थे । तब मैं तुम्हारे नाग से केशो को संवार, वेणी में कमल के फूल सजा देता था । वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे , जब तुम अपनी मधुर सुरीली सी आवाज से , मुझे मधुर तान में गीत सुनाया करती थी , मैं सावन के झूले में झूलते हुए भावविभोर हो उठता था न जानें वे दिन अब कैसे लौटेगें ।


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