मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

आधुनिकता- स्वयं तिमिर

मानसी शर्मा

सर्वत्र उजियारा बिखरा, पर अंधकार की छाया है, विडंबना काल की देखो, तिमिर में विश्व समाया है। . कितने आधुनिक हो गए हम, विवेक का घटता गया क्रम, ना भावना रही किसी मे सम, निज सभ्यता नहीं रही तत्सम, पश्चिमीकरण का बढ़ता भ्रम, संस्कार घट में घट रहे हरदम, दायित्व हो रहे है आज श्रम, विस्तृत हो रहा अब ये तम, इस अपुष्टित आधुनिकता की, कैसी असभ्य सी काया है, विडंबना काल की देखो, तिमिर में विश्व समाया है। . प्रगति कर रही है क्षमता , पर घट रही मन में समता, बढ़ती युवाओं में असभ्यता, विस्तृत हो रही है नग्नता, स्तर घटा रही है विनम्रता, उष्ण हो रही है शीतलता, प्रसकुटित होती जाती परता, सूक्ष्म हो रही है मानसिकता, जल थल नभ मन मे ढूँढ़ो, क्या क्या परिवर्तन आया है, विडंबना काल की देखो, तिमिर में विश्व समाया है। . संस्कार बन गए है स्मृति, उभर रही हर ओर त्रुटि, उद्भव होती अस्मर्णीय कृति, हृदयों को पहुँच रही क्षति, दुर्व्यवहार की हो चुकी अति, वृद्धान्तों की होगयी इति, न होती है मन की तृप्ति, कुछ अज्ञात आधुनिक है ये रति, आज्ञाओं का होता अनादर, बढ़ती जाती बस माया है, विडंबना काल की देखो, तिमिर में विश्व समाया है।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें