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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

क्या लिखूँ,क्या छोड़ दूँ

अमर'अरमान'

क्या लिखूँ,क्या छोड़ दूँ चुप रहूं या बोल दूँ ? झूठ लिखता हूँ, तो सम्बन्ध मधुर हो जाता है सत्य लिखता हूँ, तो ज़हर घुल जाता है। झूठ लिखता हूँ, तो मिलती है खूब बड़ाई सत्य लिखता हूँ, तो होती है सबसे लड़ाई। झूठ लिखूँ, तो लेखनी लजाती है सत्य लिखूँ, तो दुनियां सताती है। जाति-धर्म के नाम पर, आपस में लड़ाते हैं विबुधों के नाम से, काम अपना बनाते हैं। कत्ल होता है मानवता का, शर्मसार धरा होती है ऐसी कलुषित मानसिकता, क़ुदरत भी यहाँ रोती है। ध्वजा धरे सत्य की, झूठा है ईमान यहाँ खुद से है अंजान पर, जाने है भगवान यहाँ।


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