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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

कान्हा! तुम्हारी स्मृति सताती है

आंचल सोनी 'हिया'

जब सांझ कि प्रदिप्त बेला आती है प्रकृति गेरुआ चुनर से आच्छादित हो जाती है, कान्हा! तुम्हारी स्मृति सताती है।। विटप पंखुड़ी आपसदारी टकरा कर जब माधुर्य गुनगुनाती है, कान्हा! तुम्हारी श्रृंगार स्मृति आती है।। जब स्याह यामिनी गहराती जाती है चढ़ती सांकल अनिवार्य नहीं रह जाती है, कान्हा! तुम्हारी स्मृति सताती है। कुंडल सुशोभित कर्ण को जब तुम्हारी मधुर मुख ध्वनि याद आती है, कान्हा! तुम्हारी स्मृति सताती है। जब गुसलख़ाने पधारुं, व पट उतारूं अपने उजले तन को स्वयं ही निहारूं, उस क्षण यह विरह मेरी प्राण घात कर जाती है। हे कान्हा! तुम्हारी स्मृति अनंत सताती है।


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