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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

नवगीत
घन बरसेंगे

कृष्णलता यादव

कब तक खेत फसल तरसेंगे कहें कभी तो घन बरसेंगे लिखते रहे पीर की पाती शुभ साइत में पढ़ ली जाती अर्थ सही उसके निकसेंगे। तड़क-भड़क चुंधियाती आँखें सपन पखेरू भीगी पाँखें उम्मीदों के कमल खिलेंगे। सब कुछ कहती हिय की लरजन दिवस-घड़ी बढ़ जाती धड़कन मनचाहे पादप सरसेंगे। धरा धीर के पृष्ठ बाँचती ऋतु रंगीली सदा राँचती फूल-पात औ फल विकसेंगे। आपूरित हों सभी रिक्तियाँ समय लिखेगा नई तख्तियाँ मुंड़केरी पर दीप धरेंगे।

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