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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

नवगीत

चंद्रकांता अग्निहोत्री

अब तो जीवन में रस घोलें | बंद द्वार खुशियों के खोलें | अपनी भी बस क्या थी हस्ती | जा पहुंचे दुष्टों की बस्ती | किसका कान्धा और दिलासा चाहा था पल भर को रो लें | अब तो जीवन ......| पन्ने कितने बंद पड़े हैं | जैसे वर्षों नहीं पढ़े हैं | चुपके से हम सदियों से बंद स्मृतियों के पट मिल कर खोलें | अब तो जीवन .....| हार गयी थी मन की वीणा | साज हठीले मुश्किल जीना | सपनों की शैय्या पर पल भर | चाहे थोडा सा ही सो लें | अब तो जीवन ......| जब से छीनी जग ने आशा | राहों में था घना कुहासा | कठिनाइयों से क्यों घबराकर असमंजस से खुद को तोलें | अब तो जीवन ....|


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