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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

बिटिया तू क्यूँ डरी-डरी है?

बृज राज किशोर "राहगीर"

प्रभु ने पंख दिए, तब ही तो तूने उड़ने की ठानी है। आसमान तक तुझको अपनी कीर्ति-पताका फहरानी है। रानी झाँसी और अहिल्या बाई जैसे तेवर रखकर, नारी के सबला होने की कथा तुझे फिर लिखवानी है। मुझे बता, क्यूँ तेरे मुख पर चिन्ता की रेखा पसरी है? हुआ न जाने क्या, पग-पग पर खड़े दरिन्दे डाले डेरा। कभी किसी सुनसान सड़क पर चीर-हरण हो जाय न मेरा। पापा, मेरे भय को समझो, ऐसा भी तो हो सकता है, इतनी काली रात मिले, मैं देख न पाऊँ कभी सवेरा। किससे मैं उम्मीद लगाऊँ, दुनिया तो अंधी-बहरी है? बिटिया तेरे इस भय को मैं, एक पिता हूँ, समझ रहा हूँ। सच तो यह है, मैं खुद भी तो अनहोनी से डरा हुआ हूँ। लेकिन आख़िर इस भय पर भी, हमें विजय पानी ही होगी, इस भय के प्रकरण में ही मैं, एक नतीजे पर पहुँचा हूँ। भय की काट करेगा भय ही, भय पर ही दुनिया ठहरी है।। आत्मसुरक्षा की ख़ातिर तो, तुझे सिपाही बनना होगा। घातक बाण चढ़े इक धनु की प्रत्यंचा सा तनना होगा। बुरी दृष्टि जो डाले तुझ पर, बुरी तरह पछताए बेटी, धर काली का रूप तुझे फिर, खप्पर लिए निकलना होगा। रक्तबीज की वंशबेल अब दुष्कर्मी बनकर उभरी है।। बिटिया अपने पास हमेशा मिर्च पाउडर और ब्लेड रख। जाने कहाँ काम आ जाएँ, नाखूनों की धार तेज़ रख। महज़ निहत्था होना तेरी कमज़ोरी का चिन्ह बना है, रक्षा के उपकरण, साथ में हिम्मत का लावा सहेज रख। अपराधी को साफ़ पता हो, तू हथियारों की गठरी है।। दुष्कर्मी को त्वरित दण्ड में, क़ानूनी हथकण्डे बाधक। दुराचारियों में भय फैले, तू खुद ही बन भय-संवाहक। नराधमों को फाँसी वाला दण्ड न जाने कब दे कोई, ऐसे दुर्दमनीय नरों को एक वार कर बना नपुंसक। आख़िर और करें भी क्या जब न्याय महज अन्त्याक्षरी है?

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