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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

पिया, भोर होन तक रहियो

डॉ० अनिल चड्डा

पिया, भोर होन तक रहियो, कुछ सुनियो और कुछ कहियो। मेरा काजल बहता जाये, गजरा भी कहता हाय, बिखरे-बिखरे गेसू हैं, अब कौन इन्हें सुलझाए, मेरी सूनी अँखियों में, थोड़ा प्रेम कजरवा भरियो, पिया भोर होन तक रहियो, सपनों की दुनिया सूनी, दिल की धड़कन है दूनी, हर बात मुझे बहकाये, हर रात अकेली जाये, यूँ संगदिल मत बनियो, तरस कभी तो करियो, पिया भोर होन तक रहियो,

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