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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

याद आता है मुझे

ऋचा चौधरी "सहर"

मर चुका हर एक रिश्ता याद आता है मुझे कोई सच्चा, कोई झूठा याद आता है मुझे देखकर मुझको झुका लेता था जो पलकें सदा हाँ वही भोला सा लड़का याद आता है मुझे क़ैद जिसमें उम्र भर पंछी की तरह मैं रही बंदिशों का अब वो पिंजरा याद आता है मुझे कोड़ियों में दे रहा था जो करोड़ों की दुआ हाथ फैलाता वो बूढ़ा याद आता है मुझे खेत में काका के चोरी चोरी घुसना और फिर खट्टे मीठे बैर चखना याद आता है मुझे कुछ बरस पहले रहा करता था जो भीतर मेरे आज वो अल्हड़ सा बच्चा याद आता है मुझे रात भर सुनता है मेरे साथ जो ग़ज़लें "सहर" हर अमावस को वो चन्दा याद आता है मुझे

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