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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 95,अक्तूबर(द्वितीय), 2020

आज़ाद ख़यालों में पले होते हम

बृज राज किशोर 'राहगीर'

गो कि आज़ाद ख़यालों में पले होते हम। बेहयाई की इमारत के तले होते हम। कामयाबी के कई ताज पहन लेते, गर वक़्त की माँग के माक़ूल ढले होते हम। चालबाज़ी से अगर मात नहीं दे पाए, सोचते हैं वे ज़रा और भले होते हम। आप जलते तो सही एक शमा के जैसे, ख़ूब लोबान की मानिन्द जले होते हम। गाँव पहुँचे भी नहीं थे कि अंधेरा छाया, काश क़दमों से ज़रा तेज़ चले होते हम।

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