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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

वक़्त रूठे हुये रहते हो

सलिल सरोज

बेटियों को देखकर यही समझ आता है वक़्त किस तरह तेजी से गुज़र जाता है जिन हाथों में गुड्डे-गुड़ियाँ खेला करते थे न जाने कब कागज़ कलम उतरआता है हाथ पीले देखकर , दुल्हन बनी देखकर आँखों को केवल रोना ही नज़र आता है वो सब छोटे जूते,वो उसकी तुतली बातें रह रह कर पूरे घर में ही पसर जाता है

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