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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

अश्क़ की बूँदों से

नरेन्द्र श्रीवास्तव

रोशनी हो न सकी,छाया अँधेरा इतना। कि दिये की तरहा दिल को भी जलाया मैंने। उनके आते वहाँ, महफिल में रौनक आयी।। वो क्या जाने कि इधर क्या है लुटाया मैंने।। मेरी तनहाई में कभी, शहनाई न बजी। स्वप्न-फूलों से अरमानों को सजाया मैंने।। अश्क की बूंदों से इक समंदर है बनाया। खुद भी डूबे और दिल भी डुबोया मैंने।।

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