मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

उलझ गई ज़िंदगी

डॉ० अनिल चड्डा

चाहतों में ही उलझ गई ज़िंदगी, जाने कहाँ खो गई ज़िंदगी। सौ-सौ सवाल किए, कितने बवाल किए, फिर भी तो चुप रही ज़िंदगी। कितना भागा किया तुझे पकड़ने को, तू वहीं खड़ी रही ज़िंदगी । मिलती रहीं तुझे परिभाषाएँ अनेक, अपनी ही परिभाषा गढ़ गई ज़िंदगी। मुसकानों के पीछे स्वार्थ छिपे हैं, कितने धोखे खा गई ज़िंदगी। कैसे नाम दूँ तुझे खुशी का मैं, हर कोने पर सिसक रही ज़िंदगी

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें