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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

मुझे बस इन्सान रहने दे

अजय प्रसाद

रोजमर्रा के जद्दो-जहद में परेशान रहने दे रहम करो रहनुमाओं मुझे बस इन्सान रहने दे । ये हिन्दू,ये मुसलमां,ये सिक्ख और ये ईसाई मजहबी नाम पर ये वोटों की दुकान रहने दे । कब तक बेचेगा ज़मीर जम्हुरियत के बहाने चैनो-अमन अहले वतन हिन्दूस्तान रहने दे । महफूज़ रहते हैं मजहब लोगो के दिलों में कुरान मस्जिदों में ,मंदिरों में भगवान रहने दे । बहुत फिक्र है न तुझे अपने कौम के लोगों की तो बस जिसकी जैसी है यहाँ पहचान रहने दे ।

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