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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

किया आगाज नहीं

अजय प्रसाद

किसी तारीफ़ का हूँ मैं मोहताज नहीं लोग करेंगे कल ज़रूर,भले आज नहीं । नयी सोच अपनाने में वक़्त तो लगता है यकमुश्त ही बदलते रस्मो- रिवाज़ नहीं । जाने कितने फनकार गुजरे गुमनाम ही झेल सका जिनको कभी ये समाज नहीं । अंजाम-ए- मोहब्बत का था इल्म पहले ही आरज़ू तो की मगर किया आगाज नहीं कितने मतलब परस्त हो तुम भी अजय अपनी गज़लों पर किया कभी नाज़ नहीं

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