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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

विचार प्रवाह

अंजली श्रीवास्तव

कभी - कभी मन बहुत उदास हो जाता है। सब कुछ होने के बावजूद भी। समझ नहीं आता क्या करें? कैसे रहें कि लोगों को हम अच्छे और हमेशा सही लगें।

हम अपनों को सदा खुश रखने के चाह में लगे रहते है।फिर भी उसका कोई भी अच्छा परिणाम नज़र नहीं आता। हम उस हर शख़्स के नज़र में वैसे ही दिखते है या यों कह लीजिए कि हम उन्हें जैसा दिखाते है, वैसे ही हम उन्हें दिखते है।

किसी को खुश करने के चाह में हम हमेशा दुःखी ही रहते है।

नियति में क्या लिखा है कुछ पता नहीं। शायद इससे ईश्वर ही भली - भांति अवगत होगा। तभी तो हमें हर राह पर चलने की शक्ति प्रदान करता है। एक नई दिशा में चलने के लिए संकेत देता है।

जिंदगी खूबसूरत भी है। बदसूरत भी है।

कभी उतार तो कभी चढ़ाव भी है।

जब हम खुश होते है तो ये जीवन हमें जन्नत सी लगती है। पर जब कभी कोई अपना रूठ जाए तो ज़िन्दगी बहुत ही वीरान सी नज़र आने लगती है।

नयना तड़पे रो - रो कर
भाव मन के धो - धो कर

काट रही हूं अब मै शायद
जो चली थी बीज बो - बो कर....


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