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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

किराए की ममता

शुचि 'भवि'

स्नेहा अंदर ऑपेरशन थिएटर में थी और निम्मी बाहर बैठे सोच रही थी,वक़्त भी कैसे और कब करवट लेता है,आज स्नेहा भी उन्हीं भावों से गुज़र रही होगी,जिनसे वो अक्सर गुज़रती है।

रूपवती,छरहरे बदन,गौर वर्ण की मालकिन स्नेहा की क़िस्मत भी ईश ने अजीब ही लिखी थी।विवाह के आठ वर्षों तक जब गोद नहीं भरी तो उसने स्वयं ही अपने पति अजीत से दूसरे विवाह का आग्रह किया।गाँव में बाँझ के ताने उसकी अब आदत में शुमार हो चुके थे मगर अजीत एक खुले दिमाग़ के मालिक थे।उन्होंने घर के सदस्यों से आग्रह कर स्नेहा को शहर बुला लिया था और वहाँ तमाम तरह के इलाज भी जब नाकाम हो गए तब अजीत और स्नेहा को निम्मी रूपी सेरोगेट मदर से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।एक वर्ष बाद ही स्नेहा की स्वयं की भी गोद हरी हो गयी।अजीत और स्नेहा इस ख़ुशी को ठीक से महसूस भी नहीं कर पाए थे और एक रोज़ एक एक्सीडेंट में अजीत चले गए।

कुलटा,पति को लील गयी इत्यादि आभूषणों से सुसज्जित कर ससुराल घर से स्नेहा को विदा कर दिया गया।

शहर में पति अजीत के ऑफिस में उसने आया की नौकरी और पास की बस्ती में एक झोपड़ी लेकर अपना जीवन आरंभ किया।

"स्नेहा यहीं काम करती है क्या?", निम्मी की आवाज़ सुन स्नेहा तुरंत ही दौड़ी आयी और निम्मी को गले लगा ख़ूब रोई।

"मेरा बेटा कहाँ है,मिलवाओ",निम्मी ने आग्रह किया।

घर पर निम्मी ने स्नेहा के हाथ में पैसे रखते हुए कहा,"मुझे जब तुम्हारी परिस्थिति के बारे में पता चला तो मैं तीसरी बार किराए की माँ बनी,ये पैसे वहीं से मिले हैं,तुम रखो, दोनों बच्चों को अच्छे से पालो"।

"स्नेहा क्या तुम भी सेरोगेट मदर बनना पसंद करोगी?"।

बच्चों के लालन-पालन की सोच ने स्नेहा से हामी भरवा दी थी।

स्नेहा जैसे ही ऑपेरशन थिएटर से बाहर आई, निम्मी को पास बुलाकर बोली, "निम्मी,हर किसी को भगवान मसीहा नहीं बनाते।मुझमें तुम्हारे जितना बड़ा जिगर नहीं है कि जिसे नौ महीने अपने ही ख़ून से सींचा हो उसे ख़ुशी- ख़ुशी दूसरों की ख़ुशी के लिए दे दूँ और रोज़ अपने ममत्व को अश्कों का गंगा स्नान करा कर चैन से सो लूँ।मैं अब दोबारा कभी किराए की माँ नहीं बनूँगी।तुम वाकई महान हो निम्मी, ख़ुद के तीन बच्चों के होते हुए भी,तुम कितने ही दम्पतियों को ख़ुशी देकर उनकी दुआएँ लेती हो,अपने लहू सींचे दिल के टुकड़े को अलग कर।किराए की कोख़ तो मैं दे सकती हूँ, मगर किराए पर ममता कैसे दूँ????"


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