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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

खुशबुओं के पंख

डॉ. रंजना वर्मा

रवि स्टेशन के लिये रवाना हो गया । रीना का व्यवहार उसे कुछ अजीब सा लग रहा था । पूछने पर भी जब उसने कुछ न बताया तो वह दूसरी ट्रेन से ही वापस चला गया ।

और अब ...

उसके चले जाने के बाद कितना खाली खाली सा महसूस होने लगा है । परंतु निर्णय तो उसे लेना ही होगा फिर चाहे वह कितना ही कठोर , कितना ही दुखदायी क्यों न हो । जो वह रवि से कह नहीं पाई उसे पत्र में लिखने का निश्चय कर रीना ने कलम उठा कर लिखना शुरू किया -

'प्रिय रवि' , नहीं नहीं । प्रिय शब्द मन की अथाह चाहत को कहाँ समेट पाता हैं । तब ?

'मेरे अपने रवि', हाँ , अब ठीक है । उसने संतुष्टि से सिर हिलाया और पत्र लिखने लगी ।

"मेरे अपने रवि ,

बहुत बहुत प्यार करती हूँ तुम्हें । पता नहीं तुम करते हो या नहीं । तुम्हारे मन की तुम जानो । मैं तो बस अपने मन की बात ही जानती हूँ । अब बहुत कुछ तुम्हारे मन को भी समझने लगी हूँ शायद तभी तो हमेशा तुम्हें अपने निकट महसूस करती हूँ । तुम्हारे एहसास की खुशबू हरदम साथ रहती है मेरे । कभी आँसुओं से भीग कर बरसात की पहली वर्षा में भीगी मिट्टी की सोंधी खुशबू तो कभी जाड़े की गुनगुनी धूप बनकर हलकी सी हरारत बन जाती है । ये खुशबुएँ पंखों वाली तितलियाँ बनकर मंडराती रहती हैं मेरे चारो तरफ़ । वादा किया था तुमसे कि कभी कुछ नहीं लिखूंगी तुम्हें लेकिन इस मन का क्या करूँ जो हर पल तुमसे , सिर्फ़ तुमसे जुड़ा रहना चाहता है ।

जानती हूँ कि हमारे इस प्यार का कोई भविष्य नहीं है । तुम विवाहित हो । किसी के पति , किसी के पिता ... तुम्हारे जीवन मे कहीं रत्ती भर का भी स्थान नहीं है मेरे लिये फिर भी .... फिर भी मैं रह ही नहीं पाती तुम्हें प्यार किये बिना । तुम्हारी यादें मेरे अकेलेपन की साथी बन गयी हैं । कैसे भुला दूँ उन्हें ? और यह क्या मेरे वश की बात है ?

क्यों आये तुम मेरे जीवन में ? यदि आये भी तो सहज सम्परिचित या मित्र बन कर रहते । इतनी आत्मीयता , इतना प्रेम जताने की क्या जरूरत थी ? बंद रहने देते मुझे अपनी एकाकीपन की गुफ़ा में । खो जाने देते मेरा अस्तित्व । परन्तु ... अब जो हो गया उसे तो अनकिया नहीं किया जा सकता ।

सोचती हूँ एक बार फिर अजनबी बन जाएं हम । हर बार हार जाती हूँ स्वयं से ही । तुम मदद नहीं करोगे मेरी ? तुम स्वयं को नियंत्रित करलो और मैं भी खुद को समेट लूँ । न तुम्हारी नजरों में मेरे लिये कोई पैग़ाम हो और न मेरी दृष्टि तुमसे कोई अपेक्षा करे । दोगे न इस मुहिम में मेरा साथ ? मैं नहीं चाहती कि हमारे प्रेम की पावनता काली घटा बन कर तुम्हारे दाम्पत्य जीवन को छिन्न भिन्न कर दे । ऐसा तो मेरे लिये भी असहनीय होगा । मेरी चिंता न करना मेरे मीत , मेरे साथ तुम्हारे प्यार की खुशबुएँ हैं न जो अब तितलियाँ बन गयी हैं । उनकी मोहक सुगन्ध और तुम्हारे प्यार की यादों को अवलम्ब बना लूँगी मैं अपना । बस , अब और नहीं ........"

और कलम छूट गयी रीना के हाथ से । मेज पर सिर टिका लिया उसने । आँखों से दो बूँद अश्रु चू पड़े पत्र पर ।

खुशबुओं के पंख भीग रहे थे और उनसे बरसात में भीगती मिट्टी की सोंधी गन्ध उड़ने लगी थी ।


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