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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

हाँ वो है एक लड़की

शिखा परी

ये चेहरा ढकती है डरी सहमी सी बैठी है कचहरी में चल रही चर्चा इसकी है सुनते हैं इसके साथ ऐसा हुआ ऐसा नहीं वैसा भी हुआ ये जो चुपचाप बैठी है ये इसकी खामोशी है कहाँ से आई है कचहरी की कहानियों में छाई है न्यूज़पेपर का फ्रंट पेज इसकी ही आयी है बलात्कार हुआ उसका कोई नहीं सिसका भीड़ ने नोचा चील कुत्तों से बच के आयी है ये वही है जो कचहरी में छाई है अब समाज है बिदकता आदमी यहाँ हँसता कैंडल मार्च की बाढ़ सी आयी है होती हर जगह रुसवाई है वो मिन्नतें है करती कोई सुनने का नहीं सोचता सब बातें हैं बनाते सहानुभूति झूठी दिखाते जिन भेड़ियों ने नोचा वो शान से घूमता जो नुच गया वो चुप रहता ये दुनिया की बिरादरी न लेगा कोई अब ज़िम्मेदारी यहाँ पैसा है महँगा इंसान है सस्ता जब ऐसी फ़ाइल है बढ़ती इंसानियत है मरती यहाँ ख़रीदे हुए सब है तू क्यों नहीं समझती दम तोड़ती हुई वो बोलती अब कभी नहीं होगी ये गलती न्याय के लिए तरसती हाँ वो है एक लड़की


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