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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

जिन्दगी

शम्भु प्रसाद भट्ट "स्नेहिल"

जिन्दगी कहते हैं किसे ? जो स्वयं की सुख-समृद्धि व संपन्नता तक ही सीमित रहे उसे•••? या स्वयं के स्वार्थ हेतु दूसरों को धोखा दे उसे•••? अथवा कदम-कदम पर स्वयं धोखा खाकर भी आगे बढ़ता ही रहे उसे•••? या लाख कोशिश करने पर भी सफलता प्राप्त न कर पाये उसे•••? अथवा सदा अभावों में रहकर भी खुशी से जीता रहे उसे•••? या स्वयं के लाभ की अपेक्षा अन्य समस्त जीव जगत् की सेवा करता रहे उसे•••? अथवा इस जीवन को सदा प्रभु भक्ति में ही सतत् संलग्न करे उसे•••? या मेहनत के बजाय भीख मांग कर जीवन गुजारता रहे उसे•••? अथवा दूसरों के रहमो-करम पर जीने को सदा मजबूर रहे उसे•••? या दुर्व्यसनों का सेवन कर स्वयं के साथ अन्यों का भी जीवन जीना दूभर कर दे उसे•••? अथवा आपराधिक जगत् का सरताज बन दूसरों को सताता रहे उसे•••? या सांसारिक माया-मोह को छोड़कर निर्जन क्षेत्र में तपस्वी जीवन जीता रहे उसे•••? सच्च कहूँ तो, सफल जीवन कहते हैं उसे, जो लाख परेशानी के बावजूद भी स्वयं के साथ-साथ दूसरों को भी सुख से जीना सिखाये तथा मानवीय जीवन की मानवीयता को कभी न भुले, असली जिन्दगी कहते हैं उसे।।।


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