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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

माँ का घर

शबनम शर्मा

दूर अति दूर से आई बेटी, घर के आँगन में आते ही, बन जाती नन्हीं चिड़िया। माँ आज भी पुकारती उसे, उसी नाम से, जो सहेजा था उसके पैदा होने से पहले। पुकार माँ की ले आती अपने संग अनगिनत यादें, जिन्हें रखा है उसने संभालकर दिल के तहखाने में, भाई का उसका नाम बिगाड़कर बुलाना, मुहल्ले वालों का उस नाम को छोटा करना और बापू का साथ में ‘बेटा’ लगाकर बुलाना। कितनी चिढ़ जाती थी जब पता चला था कॉलेज में दोस्तों को उसका वो नाम। क्यूँ तड़पी है आज जब पुकारा माँ ने ले उसका वो बचपन का नाम, क्यूँ सुनना चाहती है बार-बार वो बचपन का उसका वो नाम।


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