मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

मैं क्या हूँ?

शबनम शर्मा

ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव में, नज़र आईं, ज़िन्दगी की संकरी गलियाँ, पथरीले रास्ते, भीगी छत और गरम लू से कई हादसे। क्यूँ आखिर क्यूँ, सबकी उम्मीदें टिक जातीं इक औरत पर, चाहते, वह वही करे, जो वो चाहें, बोले सिर्फ वो शब्द, जो उन्हें भाएं, पहने वो कपड़े, खाये वो खाना, जाए उस जगह, सोचे वो सोच, जो सदैव उनके हक में हो, नहीं उसका हँसना-रोना-सोना भी प्रतिबंधित है, कुछ भी तो अपना नहीं, टटोलती हूँ खुद को, अनगिनत सवाल खड़े हो जाते मेरे सामने लगता इस जन्म में तो खुद से मुलाकात न होगी क्योंकि मैं एक औरत हूँ फिर भी कभी वक्त मिला तो बताऊँगी, सोचूँगी कि ‘‘मैं क्या हूँ?’’


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें