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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

गुलाब

सपना परिहार

सुना है तेरे शहर में गुलाब बहुत है, उसकी खुशबू मेरे शहर से होकर गुजरती है, भले ही रौनक तेरे शहर में हो, तेरे शहर के गुलाब से मेरी गलियाँ महकती है। गुलाब है तो चमन में बहार है हर लब पर सिर्फ उसका ज़िक्र बेशुमार है, वो जब खुल के मुस्कुराते है तो बहार आती है, जब गुलाब की पंखुड़ियां भी खिल जाती है। माना तुम्हें गुलाब पसन्द है, पर हम भी उनके कम मुरीद नही है। गुलाब को चाहने वाले हम भी कुछ कम नही है। तेरे हिस्से के कुछ गुलाब से मेरी झोली भरदे मेरी जिंदगी को खुशियों से भर दे, ये गुलाब जिंदगी है मेरी, इन गुलाबों से मेरी जिंदगी महकती है।


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