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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

हठधर्मिता

सलिल सरोज

तुमने अभी हठधर्मिता देखी ही कहाँ है अंतर्मन को शून्य करने का व्याकरण मुझे भी आता है अल्पविराम,अर्धविराम,पूर्णविराम की राजनीति मैं भी जानती हूँ यूँ भावनाशून्य आँकलन के सिक्के अब और नहीं चलेंगे स्त्रियों का बाजारवाद अब समझदार हो चुका है खुदरे बाजार से लेकर शेयर मार्किट तक में इनको अपनी कीमत पता है तुम्हारी इच्छाओं का बहिष्कार कोई पाप नहीं सीता,सावित्री,दमयंती का अब कोई शाप नहीं हमें काठ का बना के रखोगे तो जलती हुई राख ही मिलेगी प्रताड़नाओं, पीड़ाओं से झुलसी अहसासों की साख मिलेगी वक़्त को पिघलकर हम हथियार बना ले इससे पहले अपनी पुरूषप्रधानता की जाँच कराओ और हमें बराबर होने का सही अहसास दिलाओ


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