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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

एकता

रौली मिश्रा

हर देश में ये बीमारी की तरह फ़ैल रहे, ये कीड़े हर देश को बरवाद कर रहे, अब तो इनका पक्का तोड़ निकालना होगा, अब नहीं डरेंगे इनसे हम सब एक हो जाएंगे, आतंकवाद को तब रोक पाएंगे।। मिल जाएगी जब लकड़ी से लकड़ी एक ही धागे में तो, ये उसको तोड़ न पाएंगे, धर्म मजहब एक हमारा , फिर कैसे हम लड़ जाते हैं, अरे छोड़ो ऐसे लोगों को, जो धर्म के नाम पर लोगों को मरवाते हैं, हर धर्म मजहब जाति सब भाई-भाई को एक हम करवाएंगे, तब ही हम आतंकवाद को जड़ से खत्म कर पाएंगे।। अरे डर कर तो बुजदिल वार किया करते हैं, अरे शेर वही जो खुलकर शिकार किया करते हैं, आओ वार करो हम पर हम तैयार हैं, अरे मरेंगे हम भी तुम्हें मारकर ये हमें स्वीकार है, हम ऐसे देश के वासी हैं, जहां रहते अलग अलग देश के निवासी हैं, अरे क्यों लड़ते हो कश्मीर के नाम पर, क्यों मरवाते हो लोगों को मजहब के नाम पर, न तोड़ो हमारे देश को न भड़काओ हमारे वीरों को, हर सिपाही के अंदर एक शेर छुपा है, अगर उसको जगाओगे तो मिट्टी में मिल जाओगे हम सब जब एक हो जाएंगे, तब आतंकवाद को हम जड़ से उखाड़ पाएंगे।। जय हिन्द.....


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