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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

नफरतों का शहर

रोहित त्रिपाठी

इस दुनिया को फूंक दूं उजाड़ दूं क्या करूं। कभी-कभी सोचता हूं कि कुछ ना करूं सवार दूं।। हमें मालूम है ये नफरत देती जा रही है। मन को दिल को चोट पहुंचाई जा रही है।। फिर भी मैं कहता हूं इसे नफरत से निकाल कर प्यार दूं दुलार दूं सवार दूं यह दुनिया बड़ी नफरत गार है। अत्याचार के विरुद्ध भ्रष्टाचार के विरुद्ध। क्या करूं इस दुनिया को उखाड़ कर फेंक दूं।। फिर मैं कहता हूं इन सब को हटाकर। उन्हें प्यार दूं दुलार दूं सवार दूं यह दुनिया बड़ी नफरत गार है।।


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