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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

बता ऐ जिंदगी अब मैं क्या करूँ

रवि प्रभात

भरोसा अपने दिल पे करूँ या हाथों की लकीरों पे दिल से वो जाती नहीं लकीरों में वो आती नहीं आती जाती है सांसो की तरह फ़ुरसत में भी मिलती है खवाबों की तरह दिल चाहता है कि उलझा रहूँ मैं उस में उसके बालों की तरह बता ऐ जिंदगी अब मैं क्या करूँ


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