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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

महफ़िल में चाँद

रत्ना सिन्हा

सितारों से महफ़िल सजती है, पर चॉंद की कमी भी खलती है; आप हो चॉंद तो हम भी हैं सितारे, महफ़िल हम सजाते तो आप उसे जमाते! चॉंदनी चॉंद से है सितारों से नहीं, जैसे घंटों निहारती आँखें को शीतलता की छांव मिल गई हो; चॉंद अकेला ही काफ़ी है, वरना इस जहां में तो सितारे भी टूटा करते हैं! चॉंद की चाँदनी से हम भी अछूते नहीं; जैसे आपकी मौजूदगी में, हम कभी बिखरते नहीं; तारों की चमकती दुनियाँ ने भी, जैसे साज़िश रची हो कोई, गुमराह करने की हमें! राही हैं हम, अनजानी राहों के सफ़र ये मुश्किल, तय नहीं होते, क़दमों के निशान पक्के भी नहीं होते; गर, राहें जुदा भी हो जाए तो क्या चलना तब भी ज़रूरी है! आँखों में सँजोए रखना इन सितारों को, दूरसे ही सिर्फ़ पास होने की एहसास तो होगी; मुसाफ़िर हैं जैसे अनजानी राहों के हम, क्या पता कब, कहॉ और कैसे; किस मोड़पर, हो जाए हमारी ये मुलाक़ात! चलना तो तब भी ज़रूरी था और चलना आज भी ज़रूरी है।


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