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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

अपनत्व की ब्रेललिपि

रश्मि सुमन

हाँ! मुझे याद है कि मैंने कहा था एक दिन "जाओ, बात नहीं करनी तुमसे" आज़ाद किया तुम्हें आज से अभी से" पर कहाँ कर पाई तुम्हें आज़ाद साल दर साल तुम्हारे साथ बिताये गये एक एक पलछिन के एहसास से और मुक्त हो पाना हर उस लम्हे से नामुमकिन है... मन तो एक सांत्वना भरी आस लिये जीता है कि कभी तो बात होगी ही कभी तो सुनूँगी ही तुम्हें, जैसे हर दीवार में खिड़की की संभावना होती है और खिड़की ,आकाश की सांत्वना... कितना अच्छा लगता है एक लंबी चुप्पी के बाद बोलना और कितना बतियाती भी तो हूँ तुमसे पर फिर भी कुछ न कुछ अनकहा रह ही जाता हर बार शायद वही मन की असंख्य तहों के नीचे कहीं छुपा रहता है कोहरा सा जो अपनत्व की ब्रेललिपि में लिखा होता जिसे पढ़ने के लिये जरूरी है प्रेम में अंधा होना ... बोलने से भी ज्यादा सुकून देता है तुम्हें सुनना जैसे कोई काली घनी लंबी सर्द रात के बाद खिलखिलाती गुनगुनी धूप जैसे उमस भरी दोपहर के बाद शाम की बारिश... सुनो! जब भी कभी मैं झूठ मूठ की रुठ जाऊँ और तुमसे बातें ना करूँ तो मुझे महसूसना बारिश की बूँदों की खनक में, जब चाँद आधा दिखे तो समझ लेना मैं ही हूँ क्यूँकि जहाँ कहीं भी रहूँगी अधूरी ही होऊँगी मैं भी बस, जब जब रूठूँ तुमसे तुम खूब दिल से पुकार लेना मुझे मैं कहीं भी रहूँ आ जाऊँगी भागी भागी और खूब खिलखिलाऊँगी तुम्हारे समक्ष सच कहूँ तो उन लम्हों में मृत्यु भी मेरी , मेरे लिए जीवन से छुपने का स्थान मात्र होगी....


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